भ्रम सहित इस पीढ़ी को, भ्रम रहित करना होगा ।


भ्रम सहित इस पीढ़ी को,
भ्रम रहित करना होगा ।

ब्रेन वाश जो हो रहा,
उसे ज्ञान से भरना होगा ।

गाथा है ये क्रांति-काल की,
जब सब भाई-बंधु थे ।
इस मातृभूमि की प्रगति को,
धर्म जाति के ना फंदे थे ।

यह काव्य है उस स्वर्ण काल का,
जब देशभक्तो का जन्म हुआ ।
स्वाधीन धरा का उद्देश्य लेकर,
प्राणों का बलिदान दिया ।

यज्ञ आहुति सफल हुई,
हमे मिली एक नई धरा ।
जहाँ मिल-जुलकर सब रहते थे,
सबमे था प्रेम बड़ा ।

समय बीता, बदलाव हुए,
फिर जन्मा जातिवाद वहां ।
राजनीति को शरण बनाकर,
बढ़ने लगा यह दंश नया ।

एक समय फिर यह आया,
सब आपस में ही बट गए ।
पहले हिन्दू, मुस्लिम, सिख बने,
फिर ये स्वयं में ही छट गए ।

भगत सिंह की इस धरती को,
हमें जाति-मुक्त करना होगा ।
भारत-बंद को त्याग कर,
जाति-बंद कहना होगा ।

राम राम जपने वाले,
अब जय भीम क्यों हो गए ।
मित्र मेरे जो प्रिय थे,
वे मुझसे क्यूं रूठ गए ।

शिक्षा का विस्तार करके,
जाति रहित होना होगा ।

भ्रम सहित इस पीढ़ी को,
भ्रम रहित करना होगा ।

ब्रेन वाश जो हो रखा,
उसे ज्ञान से भरना होगा ।

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